इस्लाम में सब्र का बयान परिचय इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो इंसान को तमाम हालात में अल्लाह की तरफ रुझु करने की तालीम देता है। जब कोई इंसान मुश्किलों, परेशानियों या तकलीफ़ो का सामना करता है, तो इस्लाम उसे "शबर" यानी सब्र (धैर्य) अपनाने की हिदायत देता है। सब्र न केवल एक नैतिक गुण है, बल्कि यह एक इबादत है जो अल्लाह तआला के करीब करने वाली है। https://youtube.com/shorts/wGAaAI15Iro?si=jvdOyH56Q5Ri05-f शबर (सब्र) की परिभाषा शबर एक अरबी लफ्ज़ है जिसका मतलब है “रोकना”, “संयम रखना” या “धैर्य करना”। इस्लामी माने में शबर का मतलब है: तकलीफ़, ग़म, या इम्तिहान के वक़्त खुद को अल्लाह की मरज़ी पर छोड़ देना और कोई शिकवा न करना। क़ुरआन में सब्र की अहमियत क़ुरआन मजीद में सब्र का कई बार ज़िक्र आया है। कुछ अहम आयात 1. "इन्नल्लाहा म'अस्साबिरीन “बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।” (सूरतुल बक़रह, 2:153) 2. "वबश्शिरिस्साबिरीन..." “और सब्र करने वालों को खुशखबरी दे दो।” (सूरतुल बक़रह, 2:155) 3. "उला-इक युअज्ज़ौना अज्रहुम बि ग़ैर हिसाब" “ऐसे लोग (जो सब्र करते हैं), उन्हें ब...
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औरत के बारे में इस्लाम में क्या मसाइल बयान किए गए हैं जरा एक नज़र डालते हैं इस्लाम में औरत का स्थान बहुत सम्मानजनक और महत्त्वपूर्ण बताया गया है। कुरआन और हदीस में औरत के अधिकारों, कर्तव्यों और उसके सामाजिक व पारिवारिक दर्जे को विस्तार से बताया गया है। यहाँ कुछ मुख्य बिंदु दिए जा रहे हैं: 1. सम्मान और बराबरी कुरआन मजीद कहता है कि अल्लाह ने मर्द और औरत दोनों को एक ही जान से पैदा किया (सूरह अन-निसा 4:1)। https://youtube.com/shorts/HEboNsdzevA?si=95hAOUKmqLcR92vo अल्लाह के यहाँ इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका तक़वा (परहेज़गारी) है, ना कि उसका लिंग (सूरह अल-हुजुरात 49:13)। 2. माँ के रूप में हदीस में आता है कि जन्नत माँ के कदमों के नीचे है (सुनन निसाई)। माँ को पिता से तीन गुना अधिक सम्मान दिया गया है (सहीह बुखारी)। https://youtube.com/shorts/LNFKlbjrr0A?si=AGhzVK8IBYpJGF9G 3. बीवी के रूप में कुरआन में कहा गया कि बीवियाँ तुम्हारे लिए लिबास हैं और तुम उनके लिए लिबास हो (सूरह अल-बक़रा 2:187)। इसका मतलब है कि पति-पत्नी एक-दूसरे की ज़रूरत, सुरक्षा और सम्मान का ज़रिया हैं। नबी करीम (सल्लल्लाहु अलैहि...
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नौजवान युवा किसी के प्यार के चक्कर में पड़ गए हैं इस्लाम में उनके लिए क्या नसीहत की है इस्लाम में नौजवानों को प्यार और रिश्तों के मामले में बहुत साफ और हिकमत भरी (बुद्धिमत्तापूर्ण) नसीहतें दी गई हैं। अगर कोई नौजवान किसी के प्यार में पड़ जाए, तो इस्लाम उन्हें निम्नलिखित बातों की तरफ रहनुमाई करता है: 1. निगाहों की हिफाज़त (Lowering the Gaze): क़ुरआन में है ईमानवालों से कह दो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाजत करें (सूरह अन-नूर, 24:30) इस आयत का मकसद यही है कि इंसान अपने जज्बात पर काबू रखे और बग़ैर निकाह के किसी से दिल न लगाए। 2. हराम रिश्तों से बचना इस्लाम में शादी से पहले किसी भी तरह के जिस्मानी या रोमांटिक ताल्लुकात को नाजायज़ (हराम) कहा गया है। इसलिए किसी लड़की या लड़के से "लव अफेयर" रखना इस्लामिक नज़रिए से गलत है। https://youtube.com/shorts/LNFKlbjrr0A?si=YM0_O4gx_YEXsrit 3. दुआ और सब्र अगर कोई किसी से सच्चा और शरीफाना मोहब्बत करता है, तो उस मोहब्बत को अल्लाह के हवाले कर देना चाहिए और दुआ करनी चाहिए कि या तो अल्लाह उसे हलाल रास्ते (निकाह) से मुक़म्मल क...
फ़ानी दुनिया
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आइए इस इस्लामी नसीहत को विस्तार से समझते हैं नसीहत दुनिया की ज़िन्दगी एक सफ़र है, ठहराव नहीं। अपने आमाल ऐसे बनाओ कि जब रब से मिलो तो सर झुकाने की बजाय मुस्कुरा सको।" विस्तार इस नसीहत में बताया गया है कि यह दुनिया एक इम्तिहानगाह है, जहाँ इंसान को थोड़े वक्त के लिए भेजा गया है। यहाँ की सारी नेमतें – दौलत, शोहरत, मकान, गाड़ी – सब फानी (नाशवान) हैं। ये हमें बस कुछ वक्त के लिए मिली हैं और एक दिन इन सबको यहीं छोड़कर हमें अपने रब के सामने पेश होना है। https://www.youtube.com/@shortmotivationalvideos9389 इसलिए जरूरी है कि: हम अपने किरदार और आमाल (कामों) को सुधारें। किसी पर जुल्म न करें, किसी का हक न मारें। नमाज़ रोज़ा ज़कात जैसे फर्ज़ों की पाबंदी करें। इंसानों से अच्छा व्यवहार करें – क्योंकि अल्लाह का हक़ तो माफ़ हो सकता है, लेकिन बंदों का हक़ नहीं। क़ुरआनी हिदायत: "हर जान को मौत का मज़ा चखना है। और तुम सब अपने-अपने आमाल का पूरा बदला क़ियामत के दिन पाओगे।" (सूरह आले इमरान: 185) असरदार बात: अगर हमने अपनी जिंदगी को सिर्फ़ दुनिया कमाने में गँवा दिया और आखिरत (परलोक) की तैयारी नहीं...